Tuesday, 7 July 2015

अत्तहिय्यात क्या है?

अत्तहिय्यात
क्या आप जानते है की अत्तहिय्यात जो हर नमाज़ में पढ़ा जाता है उसका वजूद कैसे हुआ??
अत्तहिय्यात यह एक बहुत अहम दुआ है।
जब मैंने इसकी हकीकत जानी तो इसकी हकीक़त मेरे दिल को छू गई ।

अत्तहिय्यात क्या है?

अत्तहिय्यात असल में गुफ्तगु है आसमान में अल्लाह और उसके रसूल के दरमियान की मेअराज के वक़्त की, के जब हमारे नबी हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैही व सल्लम अल्लाह से मुलाकात के लिए हाज़िर हुए ।

मुलाक़ात के वक़्त रसूलअल्लाह ने सलाम नहीं किया, और अस्सलामु अलयकुम नहीं कहा । दरअसल हकीक़त में हम अल्लाह को सलाम नहीं पेश कर सकते क्योंकि तमाम सलामती अल्लाह की तरफ़ से हैं इसलिये रसूलअल्लाह ने अल्लाह को सलाम न करते हुए यह फ़रमाया:

"अत्तहिय्यातू लिल्लाहि वस्स-ल-वातु वत्तय्यिबातु "

(तमाम इबादतें, जो ज़बान के ज़रिये होती हैं, अल्लाह के लिये हैं और तमाम इबादतें जो बदन के ज़रिये होती हैं और तमाम इबादतें जो माल के ज़रिये होती हैं (अल्लाह के लिये हैं।)


इसपर अल्लाह ने जवाब दिया:

"अस्सलामु अलै-क या अय्यु-हननबीय्यु व रहमतुल्लाहि व ब-र-कातुहू"

(सलामती हो आप पर ऐ नबी!, और रहम और बरकत हों)


फिर नबी ने फ़रमाया:

"अस्सलामु अलैना व अला इबादिल-लाहिस्सालिहीन"

("सलामती हो हम पर और बन्दों पर अल्लाह के जो नेक हैं।")


यह सब वाकिआ "फरिश्तों" ने सुना और ये सब सुनकर फरिश्तों ने अर्ज़ किया:

"अश्हदु अल्ला इला-ह इल्लल्लाहु व अश्हदु-अन-न-मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू"

(हम गवाही देते हैं कि, अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक नहीं है और हम गवाही देते हैं कि, हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैही व सल्लम अल्लाह के नेक बन्दे और रसूल हैं।)

Sunday, 5 July 2015

हिकायत 1

एक आदमी जो बुतों का पुजारी था, वो एक जगह बैठ कर या सनम! या सनम! की तस्बीह पढ़ रहा था, वो या सनम, कहते कहते रात को थक गया, तो उसे ऊँघ आने लगी, जब ऊँघ आई तो उसकी ज़बान से या सनम की बजाय या समद! का लफ़्ज़ निकल गया, जैसे ही उसकी ज़बान से ये लफ़्ज़ निकला तो अल्लाह रब्‍बुल इज्‍ज़त ने फ़रमाया, ऎ मेरे बंदे! मैँ मौजूद हूँ, माँग क्या माँगता है। फ़रिश्ते हैरान हो कर पूछने लगे, ऎ अल्लाह! ये बुतों का पुजारी है, और सारी रात बुत के नाम की तस्बीह करता रहा है, अब नींद के ग़लबा की वजह से तेरा नाम निकल गया है, और तूने फौरन मुतवज्जा हो कर फ़रमाया ऎ मेरे बंदे! तू क्या चाहता है? इसमें क्या राज़ है?? अल्लाह तआला ने फ़रमाया: मेरे फ़रिश्तों! वो सारी रात बुतों को पुकारता रहा, और बुत ने कोई जवाब ना दिया, जब उसकी ज़बान से मेरा नाम निकला, अगर मैं भी जवाब ना देता, तो मुझ में और बुत में क्या फ़र्क़ रह जाता ??
(हिकायत)
जो परवरदिगार इतना मेहरबान हो, कि बंदे की ज़बान से नींद की हालत में भी अगर नाम निकल आए तो परवरदिगार उसको भी क़बूल फ़र्मा लेता हैं, तो हम होशो हवास में दुआँए माँगेंगे, तो परवरदिगार हमारी दुआँओं को कियुँ ना क़बूल फ़रमाएगा। दुआ है कि परवरदिगार-ए-आलम हमें अपनी सच्ची मुहब्बत अता फ़र्मा दे, और मौत के वक़्त हमारे पास ईमान की नेअमत सलामत रहे, और क़यामत के दिन ताजदार-ए-क़ायनात सरकार-ए-दो जहाँ मुहम्‍मद-ए-मुस्‍तफा सल अल्लाहू अलैहि वआलेही वसल्लम के झंडे के साय तले हाज़िर हो जाँए। और प्‍यारे रसूल नबी-ए-अकरम सल अल्लाहू अलैहि वआलेही वसल्लम कि शफाअत नसीब हो।
आमीन या रब्‍बुल आलामीन

Wednesday, 1 July 2015

बादशाह और एक बुज़ुर्ग

बादशाह ने एक बुज़ुर्ग से कहा मांगो क्या मांगते हो?
"बुज़ूर्ग ने अपना कशकोल आगे कर दिया और आजिज़ी से बोला। हुज़ूर! सिर्फ़ मेरा कशकोल भर दें। " बादशाह ने फ़ौरन अपने गले के हार उतारे अँगूठियां उतारें जेब से सोने चांदी की अशर्फ़ियां निकालें और बुज़ूर्ग के कशकोल में डाल दीं लेकिन कशकोल बड़ा था, लिहाज़ा उसने फ़ौरन खज़ाने के इंचार्ज को बुलाया। ... ... इंचार्ज ने हीरे जवाहरात की बोरी लेकर हाज़िर हुआ बादशाह ने पूरी बोरी उलट दी लेकिन जवाहरात कशकोल में गिरते गए कशकोल बड़ा होता गया। यहां तक कि तमाम जवाहरात ग़ायब हो गए। बादशाह को बेइज़्ज़ती का एहसास हुआ उस ने खज़ाने कि मुँह खोल दिए लेकिन कशकोल भरने का नाम नहीं ले रहा था। खज़ाने के बाद दरबारियों और तिजोरियों की बारी आई लेकिन कशकोल ख़ाली का ख़ाली रहा। एक एक कर के सारा शहर ख़ाली हो गया लेकिन कशकोल ख़ाली रहा। आख़िर बादशाह हार गया बुज़ूर्ग जीत गया। बबुज़ुर्ग ने कशकोल बादशाह के सामने उल्टा मुस्कुराया सलाम किया और वापिस मुड़ गया बादशाह बुजुर्ग के पीछे भागा और हाथ बांध कर अर्ज़ किया। हुज़ूर! मुझे सिर्फ़ इतना बता दें ये कशकोल किस चीज़ का बना हुआ है?
"बुजुर्ग मुस्कुराया, ऐ नादान! ये ख़्वाहिशात से बना हुआ कशकोल है जिसे सिर्फ़ क़ब्र की मिट्टी भर सकती है..."