Wednesday, 1 July 2015

बादशाह और एक बुज़ुर्ग

बादशाह ने एक बुज़ुर्ग से कहा मांगो क्या मांगते हो?
"बुज़ूर्ग ने अपना कशकोल आगे कर दिया और आजिज़ी से बोला। हुज़ूर! सिर्फ़ मेरा कशकोल भर दें। " बादशाह ने फ़ौरन अपने गले के हार उतारे अँगूठियां उतारें जेब से सोने चांदी की अशर्फ़ियां निकालें और बुज़ूर्ग के कशकोल में डाल दीं लेकिन कशकोल बड़ा था, लिहाज़ा उसने फ़ौरन खज़ाने के इंचार्ज को बुलाया। ... ... इंचार्ज ने हीरे जवाहरात की बोरी लेकर हाज़िर हुआ बादशाह ने पूरी बोरी उलट दी लेकिन जवाहरात कशकोल में गिरते गए कशकोल बड़ा होता गया। यहां तक कि तमाम जवाहरात ग़ायब हो गए। बादशाह को बेइज़्ज़ती का एहसास हुआ उस ने खज़ाने कि मुँह खोल दिए लेकिन कशकोल भरने का नाम नहीं ले रहा था। खज़ाने के बाद दरबारियों और तिजोरियों की बारी आई लेकिन कशकोल ख़ाली का ख़ाली रहा। एक एक कर के सारा शहर ख़ाली हो गया लेकिन कशकोल ख़ाली रहा। आख़िर बादशाह हार गया बुज़ूर्ग जीत गया। बबुज़ुर्ग ने कशकोल बादशाह के सामने उल्टा मुस्कुराया सलाम किया और वापिस मुड़ गया बादशाह बुजुर्ग के पीछे भागा और हाथ बांध कर अर्ज़ किया। हुज़ूर! मुझे सिर्फ़ इतना बता दें ये कशकोल किस चीज़ का बना हुआ है?
"बुजुर्ग मुस्कुराया, ऐ नादान! ये ख़्वाहिशात से बना हुआ कशकोल है जिसे सिर्फ़ क़ब्र की मिट्टी भर सकती है..."

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