Sunday, 5 July 2015

हिकायत 1

एक आदमी जो बुतों का पुजारी था, वो एक जगह बैठ कर या सनम! या सनम! की तस्बीह पढ़ रहा था, वो या सनम, कहते कहते रात को थक गया, तो उसे ऊँघ आने लगी, जब ऊँघ आई तो उसकी ज़बान से या सनम की बजाय या समद! का लफ़्ज़ निकल गया, जैसे ही उसकी ज़बान से ये लफ़्ज़ निकला तो अल्लाह रब्‍बुल इज्‍ज़त ने फ़रमाया, ऎ मेरे बंदे! मैँ मौजूद हूँ, माँग क्या माँगता है। फ़रिश्ते हैरान हो कर पूछने लगे, ऎ अल्लाह! ये बुतों का पुजारी है, और सारी रात बुत के नाम की तस्बीह करता रहा है, अब नींद के ग़लबा की वजह से तेरा नाम निकल गया है, और तूने फौरन मुतवज्जा हो कर फ़रमाया ऎ मेरे बंदे! तू क्या चाहता है? इसमें क्या राज़ है?? अल्लाह तआला ने फ़रमाया: मेरे फ़रिश्तों! वो सारी रात बुतों को पुकारता रहा, और बुत ने कोई जवाब ना दिया, जब उसकी ज़बान से मेरा नाम निकला, अगर मैं भी जवाब ना देता, तो मुझ में और बुत में क्या फ़र्क़ रह जाता ??
(हिकायत)
जो परवरदिगार इतना मेहरबान हो, कि बंदे की ज़बान से नींद की हालत में भी अगर नाम निकल आए तो परवरदिगार उसको भी क़बूल फ़र्मा लेता हैं, तो हम होशो हवास में दुआँए माँगेंगे, तो परवरदिगार हमारी दुआँओं को कियुँ ना क़बूल फ़रमाएगा। दुआ है कि परवरदिगार-ए-आलम हमें अपनी सच्ची मुहब्बत अता फ़र्मा दे, और मौत के वक़्त हमारे पास ईमान की नेअमत सलामत रहे, और क़यामत के दिन ताजदार-ए-क़ायनात सरकार-ए-दो जहाँ मुहम्‍मद-ए-मुस्‍तफा सल अल्लाहू अलैहि वआलेही वसल्लम के झंडे के साय तले हाज़िर हो जाँए। और प्‍यारे रसूल नबी-ए-अकरम सल अल्लाहू अलैहि वआलेही वसल्लम कि शफाअत नसीब हो।
आमीन या रब्‍बुल आलामीन

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